मुख पृष्ठ | प एवं मू केंद्र | साइट मानचित्र | संपर्क करें | जिज्ञासाएँ  
रापसे - भारत : संक्षिप्त परिचय

(शिक्षा पर हो रहे बड़ी मात्रा में खर्च के अकादमिक अंकेक्षण और गुणवत्ता नियंत्रण संबंधी देश की मूल्यांकनपरक आवश्यकताओं की पूर्ति का एक अभियान)

 प्रस्तावना
 उद्देश्य
 अनुप्रयोग
 कार्यनीतियाँ
 परामर्श तंत्र
 लाभार्थी

प्रस्तावना  • आकलन, प्रत्यायन, मूल्यांकन और परीक्षण की विद्यमान संस्थाओं जैसे - यूजीसी का नैक, एआईसीटीई का एनबीए, एमसीआई का एनबीई, विश्वविद्यालयों की मूल्यांकन इकाईयाँ, परीक्षा निदेशालय आदि 1 का व्यावहारिक अधिकार क्षेत्र शिक्षा के विशिष्ट प्रक्षेत्रों, उद्देश्यों और स्तरों तक ही सीमित है। • लेकिन देश की विभिन्न संस्थाओं से प्राप्त मूल्यांकन संबंधी बहुविध मांगों (जो कि संपूर्ण शिक्षा-व्यवस्था को संकेतित करती हैं) को पूरा करने के लिये कोई भी सर्वव्यापक प्रणाली उपलब्ध नहीं है। • इस कमी को पूरा करने के लिये राष्ट्रीय परीक्षण सेवा या राष्ट्रीय मूल्यांकन संगठन की स्थापना (जैसा कि शिक्षा संबंधी विभिन्न आयोगों द्वारा उल्लिखित किया गया और एनपीई/पीओए 1986 के संशोधित अनुच्छेद 5.40, 5.41, एनपीईआरसी 1990 तथा सीएबीई 1992 2 के अंतर्गत विचारित किया गया) की प्रस्तावना वर्ष 2004 में भारतीय भाषा संस्थान की ढाई दशक पुरानी इकाई परीक्षण एवं मूल्यांकन केंद्र द्वारा की गई। • तदनुसार केन्द्रीय योजना आयोग की सहमति से सक्षम अधिकारी की प्रशासनिक स्वीकृति सी.टी एवं ई 3 को राष्ट्र में प्रथम बार 1-7-2006 से राष्ट्रीय परीक्षण सेवा की योजना बनाने एवं इसे लागू करने के लिये प्रदान की गयी।


उद्देश्य  • शिक्षा के साधनों एवं लक्ष्यों (विषय वस्तु, वैयक्तिक विकास एवं सामाजिक आवश्यकताओं) को क्रमबद्ध रूप में सभी शैक्षिक अनुशासन के संदर्भ में सूचीबद्ध करना, शुरूआत भाषा एवं साहित्य से। • शिक्षा के सात सामान्य स्तरों (प्राथमिक, उच्च प्राथमिक, माध्यमिक, उच्चतर माध्यमिक, स्नातक, स्नातकोत्तर एवं अनुसंधान) के अंतर्गत उनको परिसीमित एवं वितरित करना। • शिक्षा के सात सामान्य स्तरों (प्राथमिक, उच्च प्राथमिक, माध्यमिक, उच्चतर माध्यमिक, स्नातक, स्नातकोत्तर एवं अनुसंधान) के अंतर्गत उनको परिसीमित एवं वितरित करना। • व्यापक संकल्पना आधारित अनुस्तरित पाठ्यक्रम का विकास जो शिक्षा के उपर्युक्त सभी स्तरों पर लागू हो, जिससे शिक्षण, अधिगम एवं मूल्यांकन की प्रक्रिया को व्यवस्थित किया जा सके। विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के सूचनात्मक एवं बहिर्वेशीय पक्षों के आकलन हेतु विभिन्न मापन पद्धतियों (अभिक्षमता, उपलब्धि एवं प्रवीणता) का विकास करना। • भाषा एवं साहित्य में उच्चतर माध्यमिक एवं स्नातक स्तर पर समाकलन एवं मूल्यांकन के लिए आवश्यक सूचनाओं एवं सबूतों का संग्रह, समेकन एवं मापन हेतु उपकरणों एवं मापनियों का निर्माण। • विकसित पाठ्यवस्तु एवं पद्धतियों पर जनमत तैयार करना तथा उन्हें देश के विभिन्न क्षेत्रों में प्रयोग हेतु मानकित करना। • क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय मानकों का विकास करना (i) पाठ्यक्रमों एवं शैक्षिक कार्यक्रमों (पाठ्यक्रम आगम एवं उनके परिणामों के संदर्भ में) हेतु (ii) इन्हें लागू करने वाली संस्थाओं एवं विभागों के लिए (सामाजिक सम्बद्धता की सीमा एवं आवश्यक ढाँचे के संदर्भ में) एवं (iii) शिक्षा के विभिन्न स्तरों से पूर्व, उनके दौरान एवं उनके बाद विद्यार्थियों की शैक्षिक आवश्यकताओं हेतु।


अनुप्रयोग   • उपर्युक्त उद्देश्यों की पूर्ति से संपूर्ण शिक्षा-प्रणाली में अनेक अनुप्रयोगिक मूल्य समाहित होंगे। • शैक्षणिक प्रक्रिया की प्रत्येक गतिविधि (शिक्षण, अधिगम एवं मूल्यांकन) के प्रत्यक्ष उपयोगिता मूल्य (सामाजिक प्रासंगिकता) के स्पष्ट संकेतों को सुनिश्चित करना। • शिक्षा के विभिन्न स्तरों के बीच पुनरावृत्ति एवं अंतरव्याप्ति से बचने के लिए स्तरानुसार विषय-वस्तु की मात्रा का निर्धारण। शिक्षा के क्षेत्र से संबद्ध सभी लोगों जैसे - शिक्षकों, विद्यार्थियों, मूल्यांकनकर्त्ताओं, नीति निर्माताओं एवं निर्णय कर्त्ताओं के लिए उत्तर दायित्वों का निर्धारण। • देश में शिक्षा - व्यवस्था की तमाम जटिलताओं को ध्यान में रखते हुये नामांकन, प्रमाणन एवं नियोजन हेतु मानकों एवं स्तर चिन्हों का निर्धारण। • समता के संवैधानिक उद्देश्य की प्राप्ति हेतु अंतर एवं अंतः 4 स्तरीय तुलनीयता के अनुपालन के लिए एक सामान्य आधार (संदर्भ बिन्दु) का विकास। • व्यापक स्वीकृति प्राप्त एवं व्यावहारिक निर्णय लेने के लिए एक केन्द्रीय प्रविधि के रूप में मूल्यांकन की वैज्ञानिक एवं व्यापक प्रणाली का सृजन • उपाधियों को रोजगार से अलग करना एवं यह सुनिश्चित करना कि शिक्षा का उद्देश्य है - सक्षमता का विकास।


कार्यनीतियाँ  • सभी आवश्यक मूल ढाँचों की योजना के निर्माण के लिए एवं इसे लागू करने के लिए राष्ट्रीय परीक्षण सेवा के मुख्यालय में तीन कार्यकारी समूहों - अनुसंधान एवं विकास - R & D (एक विशिष्ट पुस्तकालय सहित), सर्वेक्षण एवं प्रलेखन - S & D (इलेक्ट्रानिक सूचना ग्रिड सहित) तथा परामर्श एवं प्रशिक्षण - C & T (प्रशिक्षण माड्यूल्स एवं डाक्यूमेण्टरी फिल्मों सहित), का गठन किया गया है। • प्रारंभिक तौर पर देश के 18 राज्यों 5 में सूचना का प्रचार-प्रसार करने, उपकरण तैयार करने, उनका प्रयोग करने, आँकड़े एकत्रित करने, प्रश्न-पद व परीक्षण के विश्लेषण के लिए तथा विकसित उपकरणों के मानकीकरण हेतु क्षेत्रीय मानकों का विकास करने के लिए 60 क्षेत्रीय इकाईयों की स्थापना की जा रही है। • राष्ट्रीय परीक्षण सेवा में व्यक्तियों/संस्थाओं को अल्पावधि अध्ययन/परियोजनाओं जो मूल्यांकन के क्षेत्र में सामग्री या मानवशक्ति के विकास के उद्देश्य से हों, में वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए सहायता-अनुदान नामक एक उप-योजना प्रारम्भ की गई है। • इसके अतिरिक्त मासिक अनुसंधान शोधवृत्तियाँ (45 प्रतिवर्ष - 30 डॉक्टोरल एवं 15 पोस्ट-डॉक्टोरल) विभिन्न क्षेत्रों में युवा शोधकर्त्ताओं को मूल्यांकन के अंतरानुशासनिक क्षेत्र में शोध हेतु प्रोत्साहन स्वरूप दी जा रही हैं जिससे कि भविष्य में इस क्षेत्र में मानवशक्ति को सुदृढ़ बनाया जा सके।


परामर्श तंत्र   • देश की विभिन्न आवश्यकताओं (जो आवश्यक रूप से शिक्षा की विषयवस्तु, आगम का निर्माण करती हैं) को सुनिश्चित करने हेतु उन सभी व्यक्तियों को जो (केंद्र या राज्य के) नीति निर्धारण प्रक्रिया से जुड़े हैं, इस धारा से जोड़ने का प्रावधान किया गया है जिससे राष्ट्रीय परीक्षण सेवा द्वारा विकसित सामग्री एवं मूल्यांकन की पद्धतियाँ सार्थक, महत्वपूर्ण एवं वैध हों। • इसके अतिरिक्त मन्त्रालय द्वारा राष्ट्रीय स्तर की परामर्श समिति का जो शैक्षिक एवं दूसरे महत्वपूर्ण मामलों में परामर्श देगी, गठन किया जा रहा है। इसमें विश्वविद्यालयों के उप-कुलपति, अभिक्षमता परीक्षण (जैसे आई.आई.टी), उपलब्धि परीक्षण (जैसे सी.बी.एस.ई) या प्रवीणता परीक्षण (जैसे यू.पी.एस.सी) करने वाली संस्थाओं के प्रतिनिधि, विषय-विशेषज्ञ व मानव संसाधन विकास मन्त्रालय के वरिष्ठ पदाधिकारी भी होंगे।


लाभार्थी   • राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों के साथ सैकड़ों व्यावसायिक संस्थान - इनकी उपयुक्त अभिक्षमता की पहचान में वैधता के संदर्भ में प्रवेश परीक्षा के पुनरावलोकन हेतु। • राष्ट्र के सैकड़ों विश्वविद्यालय, हजारों महाविद्यालय और लाखों स्कूल - इनके विकास के सभी क्षेत्रों में विस्तार के संदर्भ में परीक्षाओं के परीक्षण का प्रमाणीकरण प्रस्तुत करने हेतु। • सैकड़ों नियोक्ता अभिकरण - इनमें अपनी सुयोग्यता की अपेक्षा निष्पादन की प्रासंगिकता के प्रभाव के संदर्भ में रोजगार परीक्षणों की समीक्षा हेतु। • विभिन्न विषयों के पचास लाख अध्यापक - इनके लिए शैक्षणिक अंतर्दृष्टि के निर्माण हेतु। • पांच करोड़ विद्यार्थी - इनको राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय मानदण्डों के संदर्भ में शैक्षणिक स्थिति की जानकारी हेतु। • तीन करोड़ प्रवासी एवं भारतीय मूल के नागरिक 6 - इनको विभिन्न विषयों की जानकारी प्राप्त कराने के लिए भारत में शैक्षणिक सुविधाओं के निर्धारण हेतु। • पांच करोड़ अंतर-राज्यीय प्रवासी - नये क्षेत्रों में योग्यता की स्थिति का निर्धारण करने हेतु। • विविध विद्यालय परिषद् और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग - इनके पास संस्थानों की पहचान के लिए और वित्तीय सहायता के परिमाण के निर्धारण के लिए एक वैज्ञानिक आधार के निर्माण हेतु।
अंततः देश में एक शीर्ष संस्था होगी जो शैक्षणिक अंकेक्षण, उत्तरदायित्व निर्धारण, गुण में तुलनीयता का अनुरक्षण करेगी और इसी के साथ संविधान में प्रतिस्थापित शैक्षणिक समानता को भी सुरक्षित रखेगी।

एन टी एस के द्वारा राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय मानदण्ड और मानक विकसित एवं निर्देश-चिन्ह स्थापित



1. एनएएसी (NAAC) - राष्ट्रीय समाकलन और प्रत्यायन समिति, एनबीए (NBA) - राष्ट्रीय प्रत्यायन परिषद्, एनबीइ (NBE) - राष्ट्रीय परीक्षा परिषद्, एआइसीटीइ - (AICTE) अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद्

2. एनपीइ (NPE) - राष्ट्रीय शिक्षा योजना, पीओए (POA) - कार्यक्रम/योजना, एनपीइ, आरसी (NPE, RC) - राष्ट्रीय शिक्षा नीति, राममूर्ति समिति, सीएबीइ (CABE) - केन्द्रीय शिक्षा परामर्श परिषद्

3. परीक्षण एवं मूल्यांकन का केंद्रीय पार्श्वचित्र आधिकारक वेबसाइट्स : www.ciil-miles.net और www.ciil-ntsindia.net पर देखा जा सकता है।

4. अंतर एवं अंतःभाषा तुलनीयता - उदाहरण के लिए क्या कन्नड़ का स्नातकोत्तर कश्मीरी स्नातकोत्तर से तुल्य है, क्या मैसूर विश्वविद्यालय से विज्ञान का स्नातक मद्रास विश्वविद्यालय के विज्ञान स्नातक से तुल्य है। क्या दिल्ली एनसीटीई (NCTE) के द्वारा जारी किया गया अंतिम स्कूल प्रमाण पत्र यूपी राज्य व एपी राज्य से तुल्य है।

5. आंध्र प्रदेश, बिहार, चण्डीगढ़, छत्तीसगढ़, दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, झारखण्ड, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, पुडुचेरी, राजस्थान, उत्तराखण्ड, उत्तरप्रदेश, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल

6. एनआरआइ (NRI) - अप्रवासी भारतीय, पीआइओ (PIO) - भारतीय मूल का व्यक्ति

सर्वाधिकार © 2016 राष्ट्रीय परीक्षण सेवा-भारत, प एवं मू केंद्र, विश्वव्यापी स्वत्वाधिकार सुरक्षित.